तुलसीश्याम मंदिर का इतिहास, चमत्कार और दर्शन | गिर वन का प्राचीन तीर्थ

गुजरात के गिर जंगल में स्थित तुलसीश्याम मंदिर का इतिहास, पौराणिक कथा, गरम पानी के कुंड, दर्शन समय और यात्रा मार्ग की पूरी जानकारी पढ़ें।

Mar 28, 2026 - 14:25
Mar 28, 2026 - 14:27
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तुलसीश्याम मंदिर का इतिहास, चमत्कार और दर्शन | गिर वन का प्राचीन तीर्थ

तुलसीश्याम मंदिर गिर का इतिहास

पुष्पों और हरी-भरी हरियाली से सुशोभित प्रकृति के भव्य सानिध्य में तलश्याम का स्थान है। जूनागढ़ से सताधार, कनकाई, बाणेज होते हुए गिर के जंगल में स्थित तुलसीश्याम १२३ किलोमीटर के सड़क मार्ग पर है। वहीं वेरावल-कोडीनार-उना होते हुए १९६ किलोमीटर के सड़क मार्ग से तुलसीश्याम पहुंचा जा सकता है। इस मार्ग में प्रभास, सोमनाथ, प्राची, गोरखमढ़ी आदि तीर्थों के दर्शन भी हो सकते हैं।

तीर्थधाम तुलसीश्याम मध्य गिर के जंगल में स्थित है। गिर जंगल का वर्णन कवि माघ ने अपने महाकाव्य शिशुपालवध में किया है।

उस वर्णन के अनुसार वहाँ अनेक प्रकार के सुगंधित पुष्पों वाले वृक्ष, अमृत समान फलों वाले वृक्ष, तुलसी के पौधे तथा चारों ओर ऋषि-मुनियों के सुंदर आश्रम होंगे। वहाँ यक्ष और गंधर्व विहार करते होंगे।

भगवान श्रीकृष्ण ऐसी इस विहार भूमि पर श्यामसुंदर स्वरूप में विराजमान हैं। इस गिर वन में स्थित तीर्थ की पुराण कथा इस प्रकार है:

पहले कथा

हिरण्यकशिपु के वध के बाद उनकी गद्दी पर दिति पुत्र तल नामक असुर राजा हुआ। एक समय महर्षि च्यवन ऋषि घूमते-घूमते रसातल में पहुँच गए। वहाँ असुरराज तल ने उन्हें प्रणाम कर कहा, “हे मुनीश्वर! आप यहाँ कैसे पधारे?”

महर्षि ने कहा, “हे तलराज! पृथ्वी पर गिर के तपोवन में तप्तोदक नाम से प्रसिद्ध एक तीर्थ है। वहाँ स्नान करने का बड़ा महिमा है। वहीं से घूमता हुआ मैं यहाँ आ गया हूँ।”

च्यवन ऋषि से तपोवन का महिमा सुनकर और वन की सुंदरता देखने तथा तप्तोदक में स्नान करने के लिए तलराज इस वन में आया।

तप्तिकुंड में स्नान करने के बाद उसे धर्मस्वरूप भगवान नारायण यहाँ दिखाई दिए। वे बाणावली मुनि के स्वरूप में एक साल (शाल) वृक्ष के पास खड़े थे। उस शाल वृक्ष के तने में अनेक बाण लगे हुए थे। उनके पास खड़े बाणों वाले मुनि ने ही इस तने में बाण मारे होंगे—ऐसा समझकर तलराज क्रोधित हो गया और मुनि से लड़ने लगा।

हजारों वर्ष तक युद्ध करने के बाद भी वह जीत नहीं सका। निराश होकर वह नारद ऋषि के पास जीतने का उपाय जानने गया। नारद ऋषि ने कहा, “हे दिति पुत्र तल! भगवान की इच्छा से तुम धर्मरूप नारायण मुनि को नहीं जीत सके। इसलिए तपोबल से उन्हें जीत लो।”

तब तलराज ने तप्तोदक में स्नान कर तपोबल से नारायण मुनि को प्रसन्न किया। तप से प्रकट हुए श्री नारायण भगवान ने उन्हें अपने चतुर्भुज स्वरूप के दर्शन दिए और उनकी मनोकामना पूर्ण करने के लिए अपना प्रिय वरदान देते हुए कहा, “तेरे और मेरे नाम से यह स्थान प्रसिद्ध होगा।”

इस प्रकार तल दैत्य और श्यामनारायण के नाम से यह तीर्थ तलश्याम कहलाया, जो बाद में तुलसीश्याम के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

दूसरी कथा:

गिर के इस जंगल में तुल नाम का एक असुर रहता था। श्रीकृष्ण के साथ युद्ध में पराजित होने पर वह श्याम (भगवान श्रीकृष्ण) की शरण में आया। भगवान श्रीकृष्ण की याद में उसने अपने नाम पर यहाँ तुलश्याम का मंदिर बनवाया था।

यह प्राचीन मंदिर लगभग १००० वर्ष पहले निर्मित हुआ था। जीर्ण-शीर्ण हो चुके इस मंदिर को देखकर स्थापत्य शास्त्र के अनुसार इंजीनियर भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं कि यह इतने समय तक कैसे टिका रहा। मंदिर का गर्भगृह, कौली मंडप, देवकुलिकाएँ, गूढ़ मंडप, रंग मंडप, प्रवेश द्वार सहित सम्पूर्ण स्थापत्य सोरठ (सोलंकी) काल का प्राचीन श्यामसुंदर भगवान का मंदिर है।

इसका जीर्णोद्धार ई.स. १९८७ में शुरू किया गया था। जीर्णोद्धार के बाद मंदिर और भी सुंदर तथा विशाल हो गया है।

भव्य मंदिर के पास ही गरम पानी के कुंड हैं। धर्मप्रेमी दाताओं के सहयोग से तप्तोदक कुंडों का भी जीर्णोद्धार किया गया है। इस अति प्राचीन तीर्थ तुलसीश्याम में गरम पानी के कुंडों में हजारों भाविक स्नान कर तन-मन की पवित्रता के साथ धन्यता अनुभव करते हैं।

तप्तीकुंड में स्नान कर भगवान की षोडशोपचार पूजा करने का बड़ा महिमा है। कुंड के किनारे सैकड़ों वर्ष पुराने पीपल के वृक्षों को पानी चढ़ाकर भाविक पितरों को तर्पण करते हैं। पुष्पमय हरियाली में वैष्णवाचार्य श्री महाप्रभु की बैठकजी के दर्शन होते हैं। भरपूर वनराई में मंदिर के सामने वाले पहाड़ पर रुक्मिणी माताजी का मंदिर है।

तलश्याम का मेला यहाँ भाद्रपद शुक्ल ११ (जलझीलणी एकादशी) के दिन भरता है।

जंगल-झाड़ियों में मालधारी अपने पशुओं के साथ रहते हैं। मंदिर के चारों ओर गिर का जंगल है। जगह के संचालकों ने यात्रियों की सहायता के लिए विश्रामगृह बनाए हैं। अन्नक्षेत्र में भोजन, चाय-कॉफी उपलब्ध कराई जाती है। इसके अलावा पथिकाश्रम, बांधकाम विभाग का विहारधाम, समस्त पटेल धर्मशाला, संघवी धर्मशाला आदि में यात्रियों को निवास मिलता है।

तुलसीश्याम से मात्र २ किलोमीटर दूर प्राचीन भीमचास धारा है। यहाँ पांडुपुत्र भीम ने प्यासी कुंती माता को पाताल से पानी निकालकर पिलाया था।

अमरेली से ८४ किलोमीटर पर तुलसीश्याम है। राजुला से डेडाण, जामका, रबारिका होते हुए आया जा सकता है। सावरकुंडला की बस भीमचास होते हुए आती है।

आसपास कनकाई, बाणेज, द्रोणेश्वर महादेव, भीमचास आदि के साथ-साथ जामवाला के पास जमझीर धोद और जमदग्नि ऋषि का आश्रम है। २५ फुट ऊँचाई से गिरने वाले इस झरने को देखने पर्यटक आते हैं। गिर अभयारण्य में जाने के लिए प्रवेश अनुमति आवश्यक है।

राजकोट से बगसरा, धारी, उना होते हुए बस में तुलसीश्याम आता है। तुलसीश्याम से उना मात्र ३० किलोमीटर है। उना से जैन भाइयों का तीर्थ अजारा पार्श्वनाथ और पर्यटकों के लिए दीव निकट ही है।

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