श्री रूपलमा धाम रामपरा गिर इतिहास और प्रागट्य कथा
श्री रूपलमा धाम, रामपरा का इतिहास और प्रागट्य कथा। कैसे नौ वर्ष की आयु में आई श्री रूपलमा ने नवचंडी यज्ञ चारण समाज को जोड़ा और आज भी उनके आश्रम में अखंड दीप और कल्याणकारी कार्य चलते हैं।
श्री रूपलमा धाम, रामपरा गिर इतिहास और प्रागट्य कथा
आई श्री रूपलमा का प्रागट्य आधुनिक समय में हुआ था। तारीख: 14 अगस्त 1990 (श्रावण वद 8, गोकुल अष्टमी, मंगलवार) को यह पावन घटना घटी। जूनागढ़ के गिर क्षेत्र में स्थित रामपरा गाँव में एक गरीब चारण परिवार में एक पुत्री का जन्म हुआ। जैसे-जैसे यह बालिका बड़ी होती गई, वैसे-वैसे उसे आई नागल माता (नागबाई) की माया अधिक लगने लगी। बचपन से ही जबकि दूसरे बच्चे खिलौनों के शौकीन होते थे, तब इस बालिका को भगवती की पूजा, धूप-दीप जलाने और आराधना का बहुत शौक था।
जब रूपलमा नौ वर्ष की हुईं, तब उन्होंने अपने बापूजी से कहा,
“बापू, मुझे नवचंडी यज्ञ करके समस्त चारण समाज को एकत्र करना है। चारणों को भजन और भोजन से जोड़ना है, क्योंकि वर्षों पहले चारण समाज को साढ़े तीन पहाड़ा के अनुसार विभाजित कर दिया गया था।”
चारण एक देव ज्ञाति है। जब आई रूपलमा ने साढ़े तीन पहाड़ा करने की बात अपने बापूजी से कही, तो उन्होंने समझाया,
“बेटा, हम गरीब हैं। इतना बड़ा कार्य हमारे बस का नहीं है। यह काम आसान नहीं है।”
ऐसा कहकर उन्होंने बात को टाल दिया।
फिर भी आई रूपलमा बार-बार अपने बापूजी से यह बात कहती रहीं। एक दिन बापूजी ने सोचा कि गाँव के आगेवान से बात करेंगे और रूपलमा को समझाएंगे। लेकिन उसी रात आगेवान को स्वप्न में आई रूपलमा दिखाई दीं।
दूसरे दिन सुबह आगेवान रूपलमा के बापू के पास आए। बापूजी ने कहा, “मैं तो आपके पास आने वाला ही था।”
आगेवान ने जवाब दिया, “आपकी बेटी जो करना चाहती है, उसे करने दो। वह जोगमाया है। रात को स्वप्न में उन्होंने मुझे आकर कहा कि ‘मुझे साढ़े तीन पहाड़ा करना है, आप मेरे बापू को समझाइए।’ इसलिए मैं आपको समझाने आया हूँ।”
यह सुनकर रूपलमा के बापू हैरान रह गए और बोले, “ठीक है। माताजी ने खुद ही सूचना दे दी है, तो यज्ञ हो।”
तत्पश्चात चैत्र शुक्ल अष्टमी को मात्र नौ वर्ष की आयु में आई श्री रूपलमा ने नवचंडी यज्ञ और साढ़े तीन पहाड़ा का आयोजन किया। इस अवसर पर चारण समाज के साथ-साथ अन्य अठारह वर्ण के लोग भी लाखों की संख्या में उपस्थित हुए। सूखे के वर्ष होने के बावजूद भक्तों को छाछ का महाप्रसाद और महायज्ञ का लाभ मिला। जोगमाया के कार्य तो वे स्वयं ही सुलझा लेती हैं।
इस घटना के बाद पूरे भारतवर्ष को पता चला कि चारण समाज में जन्मी आई श्री रूपलमा जोगमाया का अवतार हैं।
आज की स्थिति:
आज भी आई श्री रूपलमा रामपरा (गिर) में आई नागबाई की अखंड दीप की ज्योत जलाकर उसकी पूजा-आराधना करती हैं। वे समाज और मानव कल्याण के अनेक कार्य कर रही हैं। उनके आश्रम में गौशाला भी है।
नए आश्रम के अंदर बड़ा मंदिर, रहने की सुविधा और एक बड़ी स्कूल की व्यवस्था है। जितने भी भक्त किसी भी समय आएँ, वहाँ आई का प्रसाद कभी खत्म नहीं होता — ऐसा स्थानीय लोग बताते हैं।
ये चारण जोगमायाएँ हैं। जैसे वरूडी माताजी ने एक छोटी कुलड़ी में पूरे लश्कर को भोजन कराया था, वैसे ही इस कलियुग में आई रूपलमा ने भी वैसा ही करके दिखाया है।
जब भी जूनागढ़ जाने का अवसर हो, तो रामपरा में आई श्री रूपलमा के दर्शन और जागती ज्योत के दर्शन अवश्य करें। मैंने कभी आई या माताजी को साक्षात नहीं देखा, लेकिन आई रूपलमा को देखते ही लगता है कि मेरी आई माताजी भी ऐसी ही होंगी।
यह था रामपरा आई श्री रूपलमा का इतिहास। आज भी आई रूपलमा के आशीर्वाद से अनेकों के दुःख दूर होते हैं, वांझ-मेणा टूटते हैं। वे धूणवा और दोरा-धागे की कड़ी विरोधी हैं।
जय आई श्री रूपलमा!
जय नागबाई माता!
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