भाथीजी महाराज की अमर वीरगाथा | गायों की रक्षा के लिए सिर कटा धड़ युद्ध लड़ा
भाथीजी महाराज की वीरगाथा पढ़ें - गायों की रक्षा के लिए अधूरे विवाह छोड़कर युद्ध में गए और सिर कटने के बाद भी लड़ते रहे। फागवेल धाम, जन्म, बलिदान और भाथीजी महाराज मंदिर की पूरी कहानी जानें।
भाथीजी महाराज का इतिहास
भाथीजी महाराज का मंदिर आसपास के इलाके में बहुत लोकप्रिय है। यह डाकोर से मात्र 30 किलोमीटर और पावागढ़ से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। आसपास के क्षेत्र के बहुत से भक्त पूरे साल और खासकर गुजराती नववर्ष के दिन — कार्तिक महीने के पहले दिन, भाथीजी महाराज के जन्मदिन पर यहाँ आते हैं। डाकोर और फागवेल के पास आने वाले पर्यटकों के लिए यह एक प्रमुख आकर्षण है। भाथीजी महाराज इस क्षेत्र के योद्धा नायक के रूप में अत्यंत लोकप्रिय हैं।
गुजरात की धरती वीरता और भक्ति की अनेक कहानियों से भरी पड़ी है। ऐसी ही एक अमर गाथा है भाथीजी महाराज की। यह कहानी लगभग 300 वर्ष पुरानी है। वे गायों की रक्षा के लिए अधूरे विवाह को छोड़कर युद्ध में अपना सिर कट जाने के बाद भी लड़ते रहे, ऐसे वीर के रूप में लोगों के हृदय में बसते हैं। खेड़ा जिले और सौराष्ट्र के अनेक क्षेत्रों में उनकी पूजा होती है। राठौड़ राजपूत कुल उन्हें अपना कुलदेवता मानता है।
वंश और जन्म
भाथीजी महाराज पाटण के जयमल राठौड़ के वंशज थे। उनके पिता ठाकुर तख्तसिंहजी राठौड़ फागवेल गांव के गरासदार और क्षत्रिय वीर थे। माता अक्कलबा चिखलोड़ (या चिखड़ोल) गांव के गरासिया परिवार से थीं।
उनके चार संतानें थीं — बड़े भाई हाथीजी, बहनें सोनबा और बीनजीबा, तथा छोटे भाथीजी। हाथीजी भी वीर थे और आज उनकी भी श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है।
फागवेल का इतिहास
जन्म विक्रम संवत 1600 (ई.स. 1544) को कार्तिक मास की सुद एकम (पड़वा) के दिन खेड़ा जिले के कठलाल तालुका में स्थित फागवेल गांव में हुआ था। पुराने समय में इस गांव को फुलपद्रा के नाम से जाना जाता था। यह गांव सैनत नदी के किनारे बसा हुआ है।
जन्म के समय वे अत्यंत तेजस्वी दिखते थे। छह महीने की उम्र में उनके माथे पर नागफणी का चिह्न दिखने लगा। इसे देखकर गांववाले और परिवारजन उन्हें नागदेवता का अवतार मानने लगे। बचपन से ही वे निर्भय, घुड़सवारी के शौकीन और प्रजा के दुखों को दूर करने वाले थे।
बचपन और वीरता
भाथीजी महाराज गायें चराने जाते और नाग की सेवा करते थे। एक बार जंगल में नाग और नेवले के झगड़े में उन्होंने नाग को बचाया था, जिसके कारण नागदेव ने उन्हें वरदान दिया। तब से वे नियमित रूप से नाग को दूध पिलाते थे।
फागवेल की सीमा पर म्लेच्छ आक्रमणकारियों और मदारीयों का अत्याचार बहुत था। वे गायों को लूटते, पशुओं को हांक ले जाते और प्रजा को परेशान करते थे। छोटी उम्र में ही भाथीजी महाराज ने ऐसे आक्रमणकारियों को मार-मारकर भगा दिया। वे गरीबों के रक्षक और गौमाता के सेवक के रूप में प्रसिद्ध हो गए।
वीरगाथा विवाह और अमर बलिदान
महाराज भाथीजी का विवाह कपड़वंज के पास स्थित दूधातल गांव की कंकुबा के साथ तय हुआ था। विवाह के मुहूर्त पर सप्तपदी के मात्र चार फेरे पूरे हुए थे। ढोल-शहनाई के स्वर बज रहे थे और चारों तरफ आनंद छाया हुआ था।
अचानक खबर आई कि कपड़वंज के मुस्लिम राजा या म्लेच्छ आक्रमणकारियों ने गांव की गायों को पकड़ लिया है और प्रजा को त्रास दे रहे हैं।
भाथीजी महाराज ने विवाह के फेरे अधूरे छोड़कर तलवार लेकर घोड़े पर सवार होकर युद्ध के लिए निकल पड़े। उन्होंने गायों को छुड़ाया और शत्रुओं को हराया। लेकिन युद्ध में उनके सिर को पीछे से काट दिया गया। लोककथा के अनुसार, सिर कट जाने के बाद भी उनका धड़ युद्ध जारी रखे हुए था और शत्रुओं को पूर्ण रूप से पराजित कर दिया। ऐसा माना जाता है कि नागदेवता भी युद्ध में उनके साथ थे। इस प्रकार वे गौमाता की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। कंकुबा ने भी उनके साथ सती होकर विलीन हो गईं।
खाखरीया वन
युद्ध के बाद की घटनाएं खाखरीया वन में हुईं, जो फागवेल से लगभग 6 किलोमीटर दूर है। यह वन आज भी भक्तों के लिए पवित्र स्थल माना जाता है। खाखरीया वन में नागदेव का रोफड़ो और सरण पग के दर्शन होते हैं। इस वन में आज भी खाखर के वृक्ष देखने को मिलते हैं।
पूजा का महत्व और मंदिर
भाथीजी महाराज गौरक्षक, नागसेवक और गरीबों के रक्षक के रूप में पूजे जाते हैं। भक्तों का विश्वास है कि उनकी पूजा से साँप-बिच्छू के काटने से रक्षा मिलती है और अगर नाग काट ले तो उनका नाम लेने से विष उतर जाता है।
मुख्य मंदिर फागवेल में जन्मस्थली पर स्थित है। यहाँ पुराना और नया विशाल मंदिर है। मंदिर में अच्छी ढांचागत सुविधाएं हैं। राजस्थानी मार्बल पत्थर में कोतरी का काम अद्भुत है। यहाँ पीने का पानी उपलब्ध है। मंदिर के बाहर चप्पल-जूते रखने के लिए मुफ्त स्टैंड है। मंदिर के बाहर पार्किंग की मुफ्त सुविधा है। यहाँ एक पुराना कुआं भी है।
हर वर्ष कार्तिक मास की सुद बिज (दूसरे दिन) मेले का आयोजन होता है। वरघोड़ा, आरती, भजन और घुड़सवारी की परंपरा चलती है। वर्ष 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने यहाँ से गौरव यात्रा की शुरुआत की थी।
विरासत और प्रेरणा
भाथीजी महाराज की वीरगाथा आज भी लोकगीतों, भजनों, कथाओं और आख्यानों के माध्यम से गुजरात के गांवों में जीवित है। वे धर्म, वीरता, गौसेवा और निःस्वार्थ बलिदान का जीवंत प्रतीक हैं। हजारों भक्त मनोकामनाएं पूरी करने के लिए फागवेल धाम आते हैं।
जय श्री भाथीजी महाराज!
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