सताधार आपा गीगा भगत की पावन स्थल, जूनागढ़ के पास धार्मिक यात्रा और गादी स्थापना

सताधार, आपा गीगा भगत का पावन स्थल, जहां धर्म, गौसेवा और संत सेवा का संदेश फैला। जूनागढ़ से 56 किमी दूर स्थित, यहाँ भक्त अन्नक्षेत्र, समाधि मंदिर और आंबाजर नदी के दर्शनों का लाभ ले सकते हैं।

Mar 30, 2026 - 13:30
Mar 30, 2026 - 13:41
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सताधार आपा गीगा भगत की पावन स्थल, जूनागढ़ के पास धार्मिक यात्रा और गादी स्थापना

सताधार आपा गीगा हिंदी स्टोरी

सताधार आपा गीगा भगत की पावन जग्या वीरपुर और परब की तरह धर्म की सेवा का संदेश फैलाती सौराष्ट्र की शोभा है आपा गीगा भगत का सताधार।

जूनागढ़ से ५६ किलोमीटर सड़क मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है। साथ ही जूनागढ़-देलवाड़ा रेलवे मार्ग से भी सताधार पहुंचा जा सकता है। एस.टी. बस की सेवा हर घंटे उपलब्ध है। सड़क मार्ग से जाते समय बिलखा के पास चेलैयानो खांडणियो और शेठ सगालशा की प्रसिद्ध जगह के दर्शन हो सकते हैं। यहां के पास ही पूज्य श्रीमद् आचार्य नथुराम शर्मा का आनंदाश्रम भी है। एस.टी. बस इन दोनों जगहों पर तथा सताधार के मंदिर के पास ही रुकती है।

प्राचीन परंपरा के अनुसार काठियावाड़ के संतान सूर्य को अपना इष्टदेव मानते हैं। पांचाल में सूर्यदेव की स्थापना के बाद उनके समर्थ संतों में आपा जादर भगत हुए। उनके शिष्य दाना भगत थे। चालाला में ई.स. १७८४ से १८७८ के कालखंड में दाना भगत ने आश्रम की स्थापना की। वे गायों की सेवा करते थे और आपदा के समय आश्रम में आने वाले अतिथियों को आश्रय देते थे।

इष्टदेव के ध्यान में मग्न रहने वाले आपा दाना के पास एक दिन पुत्र गीगा को लेकर माता लाखु इस आश्रम में आईं। वह पुत्र के साथ ही वहां रहकर सेवा का कार्य करती थीं। एक समय बालक गीगा के भविष्य को देखकर दाना महाराज ने माता लाखु से कहा कि “तेरा बाल पुत्र प्रगट पीर बनेगा और लोगों द्वारा पूजा जाएगा।”

गीगा की किशोरावस्था में माता लाखु का स्वर्गवास हो गया। मातृ मोह का बंधन भी टूट गया। अब अच्छी जगह और अच्छे आपा दाना के आश्रम में गायों की सेवा करते हुए, गोबर के सुंडले उठाते हुए और निरंतर ईश्वर का जप करते हुए गीगा पर एक दिन आपा दाना प्रसन्न हुए।

गीगा के सिर पर हाथ फेरकर उन्हें पट्ट शिष्य बना लिया। वे गीगा भगत आजीवन गौसेवा और संत सेवा करते रहे और गीगेव पीर कहलाए।

पट्ट शिष्य बनाने के बाद दाना महाराज ने आशीर्वाद दिया और आश्रम की जगह से अलग करते हुए गीगा को आज्ञा दी कि “जिस जगह चूल्हे की आग से लोबान की भभक (धुआं) उठे, वहीं गादी की स्थापना करना।” आपा दाना ने आश्रम की आधी गायें दे दीं। उन गायों के साथ चालाला की फुलवाड़ी में कुछ समय रहकर गीगा भगत ने गांव छोड़ दिया।

अनेक गांवों में भ्रमण करते हुए वे गिर में आंबाआरे पहुंचे, जहां आंबाजर नदी का पानी बहता था। चारों ओर गिर की पहाड़ियों में शेरों का निवास था और मोरों के कलरव गूंजते थे।

कुदरत की गोद में अखंड पानी और हरी-भरी वनराई देखकर आपा गीगा का मन प्रसन्न हो गया। गायों को चरने के लिए छोड़कर उन्होंने चूल्हे में आग जलाई। उसमें लोबान की भभक उठते ही गुरु की आज्ञा याद आई। इस प्रकार आपा गीगा का आत्मा राजी हो गया। दाना गुरु की आज्ञा से इस धरती को मां की गोद मानकर आंबाजर नदी के किनारे गीगा भगत ने झोपड़ी बांधी। यहां विक्रम संवत १८६५ में गादी की स्थापना की और धर्म की ध्वजा फहराई। यह स्थान सताधार के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

आपा गीगा द्वारा शुरू किया गया अन्नक्षेत्र और अतिथियों का आदर-सत्कार आज भी गीगेवपीर की इस संस्था सताधार में जारी है। विक्रम संवत १९२६ में आपा गीगा ने समाधि ली। इस समाधि स्थल पर मन्नत पूरी करने और गादी के दर्शन करने के लिए असंख्य भक्त श्रद्धा से यहां आते हैं। इस संस्था के अन्नक्षेत्र में भोजन प्रसाद ग्रहण करते हैं। सताधार के इस समाधि मंदिर में आरती-दर्शन के समय श्रद्धालु भक्तों की भारी भीड़ लगती है।

आपा गीगा के अनुकरण में करमण नाम के भक्त हुए। उन्होंने विक्रम संवत १९३३ में आपा गीगा की समाधि पर देवालय (मंदिर) बनवाया।

वे महान समर्थ थे। कहावत है कि “करमण त्रुठ्या आपे दिकरा, रुठ्या खोवे राज”। इस समर्थ संत परंपरा में राम भगत और हरि भगत हुए। उसके बाद लक्ष्मण भगत हुए, जो ३२ वर्ष महंत रहे और जगह को समृद्ध बनाया। उनके बाद शामजी बापु हुए। वे ३१ वर्ष महंत पद पर रहे। उनके समय में सताधार बहुत प्रसिद्ध हुआ। इन सभी संतों की समाधियां आपा गीगा की मुख्य समाधि मंदिर के पास ओटले पर हैं।

ओटले के सामने कोठार में प्राचीन काल की घड़ाई के नमूने रूपी बर्तन देखने लायक हैं। सताधार की जगह के पास बहने वाली आंबाजर नदी के ऊपर सुंदर लक्ष्मण घाट, बगीचा तथा कुंड है। आंबाजर के पास गोमुख से शिवलिंग पर पानी का प्रवाह बहता है। सताधार से कनकाई, बाणेज और तुलसीश्याम भी जाया जा सकता है।

जय आपा गीगा भगत

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