सुदामापुरी पोरबंदर का इतिहास | श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता व दर्शनीय स्थल

पोरबंदर जिसे सुदामापुरी कहा जाता है, श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा की भूमि है। महात्मा गांधी की जन्मभूमि, सुदामा मंदिर, तारामंदिर और प्रमुख दर्शनीय स्थलों की पूरी जानकारी पढ़ें।

Mar 31, 2026 - 13:17
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सुदामापुरी पोरबंदर का इतिहास | श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता व दर्शनीय स्थल

सुदामापुरी अथवा पोरबंदर जूनागढ़ से सड़क मार्ग से १०५ किलोमीटर है। हर्षद से मात्र ३० किलोमीटर की दूरी है।

प्रिय पाठक, “पोर” का अर्थ होता है छोटी-सी बस्ती। समुद्र किनारे की ऐसी बस्ती को “पोर” कहा जाता है। ऐसी पोर में मित्रों के अटूट स्नेह की कथा है। मित्र-प्रेम से पल्लवित यह बस्ती आज शहर बनकर पोरबंदर के नाम से प्रसिद्ध है।

यहाँ एक समय श्रीकृष्ण के बालसखा सुदामा रहते थे, इसलिए इसे सुदामापुरी भी कहा जाता है। यह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जन्मभूमि भी है।

बालक सुदामा और बालक कृष्ण विद्या अध्ययन के लिए गुरु सांदीपनी ऋषि के आश्रम में पढ़ने वाले विशेष बाल मित्र थे।

विद्या प्राप्ति के बाद सुदामा ने गुरु के पास अयाचक व्रत लिया था — “किसी से कुछ नहीं माँगना” का नियम। गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर पत्नी सहित वे पोर में रहते थे। उसी समय उनके बालसखा कृष्ण द्वारका के राजा बनकर राजधानी में बैठे-बैठे भारत की राजनीति का निर्माण कर रहे थे।

प्रभु ने उस समय साकर और दूध में पौवा बड़े प्रेम से ग्रहण किया और उसका पुण्य सुदामा को अर्पित कर दिया।

इससे सुदामा की दरिद्रता का नाश हो गया। मित्र की कई दिनों तक मेहमानगत का आनंद लेने के बाद सुदामा पोर की ओर प्रस्थान कर गए। बस्ती में आकर उन्होंने देखा तो अपना घर साधन-संपन्न हो चुका था। वे बहुत प्रसन्न हुए। अयाचक मित्र की जीवनभर की गरीबी दूर करने वाले कृष्ण को याद करके उन्होंने इष्ट भक्ति में अपना जीवन व्यतीत किया।

समय के साथ समुद्र किनारे का बंदर होने के कारण पोर बस्ती का विकास हुआ और वह पोरबंदर शहर बन गया।

पोरबंदर शहर में सुदामा चौक है। चौक में सुदामाजी का प्राचीन मंदिर है। मंदिर के चारों ओर विशाल चौराहे में सत्संग चलता रहता है। यहाँ “भूल भुलैया” की रचना की गई है, जिसमें चलकर लोग पाप-पुण्य की गणना करते हैं। यह एक विरल दृश्य है।

जीवन में हमारे साथ क्या आएगा? पाप-पुण्य की गणना करते हुए इन लोगों को देखकर यह बात अवश्य याद आ जाएगी।

यहाँ का प्लेनेटोरियम जिसे तारामंदिर कहते हैं, विशेष रूप से देखने लायक है।

खगोल और विज्ञान की अद्भुतता देखने के लिए अवश्य जाना चाहिए। ग्रह, तारे और नक्षत्र देखिएगा। चंद्रमा की २७ पत्नियों के नाम वाले नक्षत्रों से परिचय होना न भूलिएगा। 

सामने ही भारत दर्शन देखने लायक स्थान है। यहाँ सम्पूर्ण भारत के सुंदर स्थल, पौराणिक प्रसंगों के चित्र और महापुरुषों की प्रतिमाएँ हैं। भारतीय संस्कृति की प्रत्यक्ष जानकारी देने वाला यह दर्शन अवश्य कीजिएगा। 

चौपाटी और महात्मा गांधी के जन्मस्थान कीर्ति मंदिर अवश्य जाकर आइए।

अस्तु

अकिंचन मित्र की भेंट तांडुल (पौवा) आज भी द्वारकाधीश को वर्ष में एक दिन आश्विन मास की शरद पूर्णिमा को चढ़ाया जाता है। इस प्रकार सबको बाल मित्र को याद रखने का संदेश रणछोड़राय देते हैं। 

उस दिन पौवा भाग्य से ही कोई गृहस्थ पत्नी बनाती है। इसलिए बाजार के पौवा खरीदकर दूध-साकर में आज भी भगवान को सौराष्ट्र में चढ़ाया जाता है। और आज भी पौवे का चेवड़ा मित्रों के लिए कुछ भी साथ लेकर जाने की भावना से भरी भेंट है।

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